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पॉलिटिक्स

पीएम मोदी: सदियों पुरानी समस्याएं सुलझ रहीं हैं, दुख का अंत हो रहा है और हमारी इच्छाएं आज सफल हो रही हैं।

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प्रधानमंत्री मोदी: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या धाम में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के शिखर पर भगवा ध्वज के आरोहण के समारोह में अपने विचार साझा किए। उन्होंने अपनी भावनाएं ‘सियावर रामचंद्र की जय, जय सियाराम’ से प्रारंभ की। उन्होंने कहा कि आज अयोध्या भारत की सांस्कृतिक चेतना का एक और उत्कर्ष बिंदु बनकर उभरी है। आज पूरे भारत और विश्व में राम का गुणगान हो रहा है। प्रत्येक रामभक्त के हृदय में अद्वितीय संतोष, गहरी कृतज्ञता, और अनुपम आनंद का भंडार है। सदियों के घाव आज भर रहे हैं। सदियों की पीड़ा का अंत हो रहा है। सदियों का संकल्प आज साकार हो रहा है। आज उस यज्ञ की पूर्णाहुति हो रही है, जिसकी अग्नि 500 वर्षों से प्रज्वलित थी, जो एक क्षण भी आस्था से नहीं डिगी और एक क्षण भी विश्वास से टूटी नहीं। आज भगवान श्रीराम का मंदिर इस धर्मध्वजा के रूप में उत्सव मनाता है।

धर्मध्वज भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण का प्रतीक है
प्रधानमंत्री ने कहा कि यह धर्मध्वज केवल एक ध्वज नहीं, बल्कि यह भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण का प्रतीक है। इसका भगवा रंग सूर्यवंश की महत्ता, ओम शब्द की गरिमा और कोविदार वृक्ष रामराज्य की प्रतिष्ठा को दर्शाता है। यह ध्वज संकल्प, सफलता और संघर्ष की गाथा का प्रतीक है। यह सदियों से चले आ रहे सपनों का साकार रुप है। यह धर्म ध्वज संतों की साधना और समाज की सहभागिता का परिणाम है। सदियों तक यह धर्म ध्वज प्रभु राम के अधूरे आदर्शों और सिद्धांतों का प्रचार करेगा। यह हमें बताएगा कि जीत हमेशा सत्य की होती है, असत्य की नहीं। यह हमारे धर्म की शक्ति को व्यक्त करेगा कि सत्य ही ब्रह्म है, सत्य में ही धर्म का अस्तित्व है। यह प्रेरणा देगा कि ‘प्राण जाय पर वचन न जाई’ यानि जो कहा जाए, वही किया जाए। यह ध्वज संदेश देगा कि ‘कर्म प्रधान विश्व रचि राखा’ यानी हमारे जीवन में कर्म और कर्तव्य का महत्व हो।

धर्मध्वज मंदिर के ध्येय का अभिव्यक्त

प्रधानमंत्री ने कहा कि धर्मध्वज यह संकल्प करेगा कि हम ऐसा समाज बनाएं, जहां गरीबी, दुख या बाधा न हो। हमारे ग्रंथों में कहा गया है कि जो लोग किसी वजह से मंदिर नहीं आ पाते और दूर से ध्वज को प्रणाम करते हैं, उन्हें भी उतना ही पुण्य मिलता है। यह धर्म ध्वज भी मंदिर के ध्येय का प्रतीक है। यह ध्वज दूर से रामलला की जन्मभूमि के प्रति श्रद्धा प्रकट करेगा और युगों-युगों से प्रभु श्रीराम के उपदेशों और प्रेरणाओं को मानवता तक पहुंचाएगा। पीएम मोदी ने करोड़ों रामभक्तों के साथ-साथ राम मंदिर के निर्माण में सहयोग देने वालों का आभार किया।

अयोध्या वह भूमि है, जहां आदर्शों का उद्भव होता है

प्रधानमंत्री ने कहा कि अयोध्या वह भूमि है, जहां आदर्श व्यवहार में व्यक्त होते हैं। यही वह नगर है, जहां से श्रीराम ने अपने जीवन की यात्रा आरंभ की थी। इसी अयोध्या ने विश्व को दिखाया कि एक व्यक्ति कैसे समाज की शक्ति और संस्कारों से महान बनता है। जब श्रीराम अयोध्या से वनवास गए, तब वे युवराज राम थे, लेकिन जब लौटे, तो मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर आए। उनके इस स्वरूप में महर्षि वशिष्ठ का ज्ञान, महर्षि विश्वामित्र की दीक्षा, महर्षि अगस्त्य का मार्गदर्शन, निषादराज की मित्रता, मां शबरी की ममता, भक्त हनुमान का समर्पण, और अनगिनत लोगों की भूमिका रही है।

राम मंदिर का दिव्य प्रांगण भारत के समग्र सामर्थ्य का प्रतीक बनता जा रहा है
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि विकसित भारत की दिशा में समाज की सामूहिक शक्ति की जरूरत है। राम मंदिर का दिव्य प्रांगण हमारे सामूहिक सामर्थ्य का प्रतीक बनता जा रहा है। यहां सप्त मंदिर, मां शबरी, और निषादराज गुह्य का मंदिर स्थित है। एक ही स्थान पर मां अहिल्या, महर्षि वाल्मीकि, महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य और संत तुलसीदास हैं। रामलला के साथ-साथ इन ऋषियों के दर्शन भी यहां होते हैं। जटायु और गिलहरी की मूर्ति छोटे-छोटे प्रयासों के महत्व को दर्शाती है।

राम रिश्तों से नहीं, भावनाओं से जुड़ते हैं

पीएम मोदी ने कहा कि इस मंदिर की आस्था मित्रता, कर्तव्य और सामाजिक एकता की मूल्यों को शक्ति प्रदान करती है। हमारे राम बंटवारे से नहीं, भावनाओं से जुड़े हैं। उनके लिए व्यक्ति का कुल नहीं, भक्ति महत्वपूर्ण है। उन्हें मोक्ष नहीं, नैतिकता प्रिय है। उन्हें शक्ति नहीं, सहयोग की महत्ता है। आज हम भी इसी भावना के साथ आगे बढ़ रहे हैं। पिछले 11 वर्षों में महिलाओं, दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, वंचितों, किसानों, श्रमिकों, और युवाओं को विकास के केंद्र में रखा गया है। जब देश का हर वर्ग सशक्त होगा, तब संकल्प की सिद्धि में सभी का प्रयास होगा। 2047 में जब देश अपने स्वतंत्रता के 100 वर्ष मनाएगा, तब हमें मिलकर एक विकसित भारत का निर्माण करना है।

हमें आने वाले दशकों को ध्यान में रखना होगा

पीएम मोदी ने कहा कि रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के अवसर पर मैंने कहा था कि हमें आने वाले एक हजार वर्षों के लिए भारत की नींव मजबूत करनी है। जो लोग केवल वर्तमान को देखते हैं, वे भविष्य की पीढ़ियों के प्रति अन्याय करते हैं। हमें वर्तमान के साथ-साथ भविष्य की पीढ़ियों के बारे में भी सोचना है। जब हम नहीं थे, यह देश तब भी था, और जब हम नहीं रहेंगे, तब भी यह देश रहेगा। हमें दूरदृष्टि के साथ कार्य करना होगा। हमें आने वाले दशकों और सदियों को ध्यान में रखना होगा।

हमें प्रभु राम के आदर्शों को अपनाना होगा

पीएम मोदी ने कहा कि हमें प्रभु राम के व्यक्तित्व को आत्मसात करना होगा। राम का अर्थ है आदर्श, सिद्धता, और जीवन का सर्वोच्च चरित्र। राम उस व्यक्तित्व का नाम है जो धर्मपथ पर चलता है और जनता के सुख को सर्वोपरि रखता है। राम ज्ञान व विवेक की पराकाष्ठा, करुणा का आदर्श उदाहरण है। राम सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, वे मूल्य, मर्यादा और दिशा हैं।

2047 तक भारत को विकसित और समाज को सक्षम बनाना है


पीएम मोदी ने कहा कि 2047 तक भारत को विकसित और समाज को सक्षम बनाना है तो हम सभी को अपने भीतर राम को जागृत करना होगा। अपने भीतर के राम की प्राण-प्रतिष्ठा करनी होगी। यह संकल्प आज से बेहतर दिन नहीं हो सकता। 25 नवंबर का दिन विरासत पर गर्व का एक अनूठा क्षण लेकर आया है। पीएम ने धर्मध्वज पर अंकित कोविदार वृक्ष का उदाहरण दिया और कहा कि यह वृक्ष दिखाता है कि जब हम अपनी जड़ों से कट जाते हैं तो हमारा वैभव इतिहास में खो जाता है। जब भरत चित्रकूट पहुंचे, तो लक्ष्मण जी ने दूर से ही अयोध्या की सेना को पहचान लिया और श्रीराम जी को बताया कि सामने जो उज्ज्वल ध्वज दिखाई दे रहा है, वह अयोध्या की सेना का ध्वज है। आज जब राम मंदिर परिसर में कोविदार फिर से प्रतिष्ठित हो रहा है, तो यह केवल वृक्ष का नहीं, बल्कि हमारी पहचान की भी वापसी है। यह हमारी सभ्यता का पुनर्जागरण है। हमें अपनी विरासत पर गर्व करना होगा ताकि हम मानसिक गुलामी से मुक्त हो सकें।

हमें आजादी मिली, लेकिन हीन भावना से मुक्ति नहीं

पीएम मोदी ने कहा कि 190 वर्ष पहले 1835 में मैकाले ने भारत को अपनी जड़ों से उखाड़ने के लिए आधारशिला रखी थी। मैकाले ने भारत में मानसिक गुलामी का बीज बोया। 10 वर्ष बाद 2035 में उस घटना को 200 वर्ष पूरे हो रहे हैं। मैंने आग्रह किया था कि हमें आने वाले 10 वर्षों का लक्ष्य तय करना है कि भारत को मानसिक गुलामी से मुक्त करना है। दुर्भाग्य से, मैकाले की सोच का प्रभाव व्यापक हो गया। हमें आजादी तो मिली, लेकिन हीन भावना से मुक्ति नहीं। हमारी दृष्टि में विकार आ गया है कि हर विदेशी चीज अच्छी है और हमारी चीजों में खोट है। मानसिक गुलामी ने स्थापित किया कि हमने लोकतंत्र विदेशों से लिया। कहा गया कि हमारा संविधान भी विदेश से प्रेरित है, जबकि सच्चाई यह है कि भारत लोकतंत्र का जनक है।

हमने नौसेना के ध्वज से गुलामी के प्रतीकों को हटाया

पीएम मोदी ने कहा कि तमिलनाडु में उत्तीर मेरूर गांव में एक प्राचीन शिलालेख है, जिसमें बताया गया है कि उस समय भी लोकतांत्रिक ढंग से शासन कैसे हुआ करता था। हमारी ऐतिहासिकता की प्रशंसा का चलन रहा। गुलामी की मानसिकता के कारण भारत की पीढ़ियों को जानकारी से वंचित रखा गया। हमारे शासन के हर क्षेत्र में इसका प्रभाव रहा। भारतीय नौसेना के ध्वज पर लंबे समय तक ऐसे प्रतीक रहे, जिनका हमारी सभ्यता से कोई संबंध नहीं था। हमने नौसेना के ध्वज से गुलामी के सभी प्रतीकों को हटा दिया है और छत्रपति शिवाजी महाराज की विरासत को स्थापित किया है। केवल डिजाइन में बदलाव नहीं हुआ, बल्कि यह मानसिकता के बदलाव का क्षण था। यह घोषणा थी कि भारत अपनी पहचान और शक्ति से पहचाना जाएगा, न कि किसी और की विरासत से।

भगवान राम अपने आप में एक मूल्य प्रणाली हैं
पीएम मोदी ने कहा कि आज अयोध्या में भी बदलाव दिख रहा है। मानसिक गुलामी ने रामत्व को नकारने का प्रयास किया है। भगवान राम अपने आप में एक मूल्य प्रणाली हैं। ओरछा के राजा राम से लेकर रामेश्वरम् के भक्त राम तक, और शबरी के प्रभु राम से लेकर मिथिला के पाहुन राम जी तक, भारत के हर घर में राम विराजमान हैं। पीएम ने कहा कि मानसिक गुलामी इतनी हावी हो गई कि प्रभु राम को भी काल्पनिक मान लिया गया। यदि हम ठान लें, तो अगले 10 वर्षों में मानसिक गुलामी से पूरी तरह मुक्ति पा सकते हैं, तब जाकर ऐसा आत्मविश्वास जगेगा कि 2047 तक विकसित भारत का सपना पूरा होगा।

हजार वर्ष के लिए भारत की नींव तभी सशक्त होगी, जब हम मैकाले के गुलामी प्रोजेक्ट को 10 वर्ष में ध्वस्त कर देंगे

पीएम मोदी ने कहा कि आने वाले हजार वर्ष के लिए भारत की नींव तभी मजबूत होगी, जब हम मैकाले के गुलामी प्रोजेक्ट को अगले 10 वर्षों में पूरी तरह ध्वस्त कर देंगे। अयोध्या धाम का रामलला का मंदिर परिसर भव्यता की ओर बढ़ रहा है। अयोध्या को संवारने का कार्य निरंतर चल रहा है। अयोध्या एक बार फिर वह नगरी बन रही है जो पूरे विश्व के लिए एक उदाहरण बनेगी। त्रेतायुग की अयोध्या ने मानवता को नीति दी थी और 21वीं सदी की अयोध्या मानवता के लिए विकास का नया मॉडल प्रस्तुत कर रही है। अयोध्या अब मर्यादा का केंद्र नहीं, अपितु एक विकसित भारत का मेरूदंड बन रही है। भविष्य की अयोध्या में प्राचीनता और नईता का संगम होगा, जहां सरयू जी की अमृत धारा और विकास की धारा एक साथ प्रवाहित होगी। यहां अध्यात्म और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का समन्वय देखने को मिलेगा।

अयोध्या के लोगों के जीवन स्तर में सुधार हेतु निरंतर प्रयास जारी

पीएम मोदी ने कहा कि रामपथ, भक्तिपथ और जन्मभूमि पथ से नई अयोध्या के दर्शन होते हैं। अयोध्या में भव्य एयरपोर्ट और शानदार रेलवे स्टेशन स्थापित हो रहे हैं। वंदे भारत और अमृत भारत एक्सप्रेस जैसी ट्रेनें अयोध्या को देश के अन्य हिस्सों से जोड़ रही हैं। अयोध्यावासियों की जीवन स्तर में सुधार लाने के लिए निरंतर प्रयास जारी हैं। जब से प्राण-प्रतिष्ठा हुई है, तब से लगभग 45 करोड़ श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आ चुके हैं। यह पवित्र भूमि वह है, जहां 45 करोड़ लोगों के चरणों की धूल पड़ी है। इससे अयोध्या और आस-पास के विकास में वृद्धि हुई है। विकास के मानदंडों में अयोध्या पीछे थी, लेकिन अब यह यूपी के अग्रणी शहरों में शामिल है।

21वीं सदी का आगमन महत्वपूर्ण

पीएम मोदी ने कहा कि 21वीं सदी का आगमन बहुत महत्वपूर्ण है। आजादी के बाद 70 वर्षों में भारत विश्व की 11वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना, जबकि पिछले 11 वर्षों में यह विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। वह दिन दूर नहीं, जब भारत तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनेगा। आने वाला समय नए अवसरों और संभावनाओं से भरा हो सकता है। इस महत्वपूर्ण कालखंड में भी भगवान राम के विचारों से हमें प्रेरणा मिलेगी। जब श्रीराम को रावण पर विजय प्राप्त करने का लक्ष्य था, तब उन्होंने कहा था कि रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए जो रथ चाहिए, उसके पहिए शौर्य और धैर्य हैं। उसकी ध्वजा सत्य और अच्छे व्यवहार की है। बल, विवेक, संयम और परोपकार इस रथ के घोड़े हैं। लगाम के रूप में क्षमा, दया और समता है, जो रथ को सही दिशा में रखते हैं।

हमें वह भारत बनाना है जो रामराज्य से प्रेरित हो

पीएम मोदी ने कहा कि विकसित भारत की यात्रा को आगे बढ़ाने के लिए ऐसा ही रथ चाहिए, जिसके पहिए चुनौतियों से टकराने का साहस और परिणाम मिलने तक दृढ़ता से डटे रहने का धैर्य हो। ऐसा रथ, जिसकी ध्वजा में सत्य और सर्वोच्च आचरण हो, जहां नीति-नीयत और नैतिकता का कभी उल्लंघन न हो। ऐसा रथ, जिसके घोड़े बल, विवेक, संयम और परोपकार हों। ऐसा रथ, जिसकी लगाम क्षमा, करुणा और समानता हो। यह पल कंधे से कंधा मिलाकर चलने और गति बढ़ाने का है। हमें ऐसा भारत बनाना है जो रामराज्य से प्रेरित हो। यह तभी संभव है, जब राष्ट्रहित सर्वोपरी होगा और स्वयंहित से पहले देशहित का ध्यान रखा जाएगा।

इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक डॉ. मोहन भागवत, राज्यपाल आनंदी बेन पटेल, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास जी महाराज, कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी जी महाराज सहित अन्य संत व गणमान्य नागरिक आदि उपस्थित रहे। संचालन श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सचिव चंपत राय ने किया।

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एंटरटेनमेंट

फिल्म-टीवी इंडस्ट्री से लेकर राजनीतिक जगत तक… राजपाल यादव को मिली मदद, तेज प्रताप ने किया बड़ा ऐलान

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बॉलीवुड अभिनेता राजपाल यादव की कानूनी मुश्किलें इन दिनों सुर्खियों में हैं। चेक बाउंस से जुड़े मामले के कारण तिहाड़ जेल में सरेंडर करने के बाद उनका दिल तोड़ देने वाला भावुक बयान सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। इसी के बाद कई लोगों ने उनकी मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाया है। राजनीति से लेकर फिल्म-टीवी इंडस्ट्री तक, उनके समर्थन में आवाज़ उठी है। हाल ही में नेता तेज प्रताप यादव ने सोशल मीडिया पर घोषणा की कि वह राजपाल यादव के परिवार को ₹11 लाख की आर्थिक सहायता देंगे।

तेज प्रताप ने की राजपाल यादव की मदद

तेज प्रताप ने अपने ट्वीट में लिखा है कि इस मुश्किल समय में राजपाल के परिवार के साथ खड़े रहना इंसानियत का काम है और यह राशि उन्हें आर्थिक बोझ से राहत देने के लिए दी जा रही है। तेज प्रताप के इस कदम से राजपाल के फैंस और सहकर्मियों ने उन्हें सराहा है। तेज प्रताप की मदद का ऐलान उस ट्वीट के बाद आया है, जिसमें आर्थिक सहायता और इंडस्ट्री के समर्थन की बात उभर कर आई थी।

सोनू सूद ने की थी पहल

इसके पहले एक्टर-प्रोड्यूसर सोनू सूद ने भी राजपाल यादव के समर्थन में भावुक अपील की थी। सोनू सूद ने कहा था कि राजपाल एक गिफ्टेड और टैलेंटेड एक्टर हैं, जिन्होंने इंडस्ट्री को कई यादगार काम दिए हैं। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि प्रोड्यूसर्स, डायरेक्टर्स और साथी कलाकारों को राजपाल को एक छोटी-सी साइनिंग फीस देनी चाहिए, जिसे बाद में उनके काम के साथ एडजस्ट किया जा सकता है। सोनू ने इसे दान नहीं बल्कि सम्मान बताया और कहा कि वह स्वयं राजपाल को अपनी अगली फ़िल्म में शामिल करेंगे।

गुरमीत भी बने राजपाल यादव का सहारा

इतना ही नहीं, टीवी अभिनेता गुरमीत चौधरी भी खुलकर राजपाल यादव के समर्थन में आए हैं। गुरमीत ने सोशल मीडिया पर लिखा कि राजपाल जैसे सीनियर और प्रतिभाशाली कलाकार को इस कठिन दौर से गुजरते देखना बेहद दुखद है। उन्होंने फ़िल्म और टीवी इंडस्ट्री से अपील की कि वह दया, मानवता और सहयोग की भावना से आगे आएं, क्योंकि “हमारी इंडस्ट्री एक परिवार है और परिवार अपने लोगों को अकेला नहीं छोड़ता।” इन प्रतिक्रियाओं से साफ़ है कि राजपाल यादव के समर्थन में कला-उद्योग के कई नामी चेहरे खड़े हैं।

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देश

चिनाब पर भारत का बड़ा दांव: सावलकोट हाइड्रो प्रोजेक्ट क्यों है ‘गेम चेंजर’? पाकिस्तान पर ‘वाटर स्ट्राइक’

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देश की सबसे ताक़तवर नदियों में शुमार चिनाब एक बार फिर सुर्ख़ियों में है। वजह है जम्मू-कश्मीर की दुर्गम पहाड़ियों के बीच आकार ले रहा सावलकोट हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट, जिसे भारत के ऊर्जा क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा और सबसे अहम दांव माना जा रहा है। यह परियोजना सिर्फ़ एक बांध या बिजली उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि ऊर्जा में आत्मनिर्भर भारत, रणनीतिक मजबूती और क्षेत्रीय विकास की नई कहानी है। चिनाब के पानी पर भारत का यह कदम इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि पाकिस्तान इसे अपनी जल सुरक्षा के लिए चुनौती के रूप में देख रहा है।

क्या है सावलकोट हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट

जम्मू-कश्मीर के रामबन और उधमपुर जिलों के बीच बहती चिनाब नदी, जहां भारत बना रहा है 1,856 मेगावाट क्षमता वाला सावलकोट हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट। यह परियोजना इतनी बिजली पैदा करेगी कि पूरे जम्मू-कश्मीर को बिजली मिल सकती है। इस मेगा प्रोजेक्ट के लिए NHPC ने 5,129 करोड़ रुपये का टेंडर केवल मुख्य सिविल वर्क के लिए जारी किया है, जबकि कुल लागत 22,000 से 31,000 करोड़ रुपये के बीच बताई जा रही है। करीब 9 साल तक चलने वाले इस निर्माण कार्य में डायवर्जन टनल, कोफर डैम, स्पाइरल टनल और लगभग 192 मीटर ऊंचा विशाल बांध बनाया जाएगा। यह प्रोजेक्ट सिर्फ बिजली का नहीं, बल्कि भारत के जल-अधिकारों के इस्तेमाल का भी प्रतीक है, जिससे पाकिस्तान की चिंता बढ़ गई है।

गौर करने वाली बात यह है कि चिनाब कोई साधारण नदी नहीं, बल्कि 1960 के ‘सिंधु जल समझौते’ के तहत आने वाली नदी है। दशकों से इस संधि की शर्तों ने भारत के हाथों को बांधे रखा था, जहां पश्चिमी नदियों सिंधु, झेलम और चिनाब के पानी का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान की ओर बह जाता था। लेकिन बदलते दौर के साथ भारत ने अपनी रणनीति की दिशा बदल दी है। दरअसल, भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में सिंधु जल संधि हुई थी, जिसके तहत चिनाब, झेलम और सिंधु नदियों का पानी पाकिस्तान को दिया गया, लेकिन साथ ही भारत को इन नदियों पर बिजली परियोजनाएं बनाने का पूरा अधिकार भी मिला। इस प्रोजेक्ट से चिनाब नदी के बहाव पर भारत का नियंत्रण बढ़ेगा। यही बात पाकिस्तान को बेचैन कर रही है, क्योंकि उसे डर है कि भविष्य में भारत चाहे तो पानी के प्रबंधन में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है।

कैसे होगा आम लोगों को फायदा

आम लोगों को इससे सीधे-सीधे कई बड़े फायदे मिलेंगे। जम्मू-कश्मीर में सर्दियों के दौरान बिजली की भारी कमी रहती है, जिसे यह प्रोजेक्ट लंबे समय के लिए खत्म कर सकता है। जब स्थानीय स्तर पर पर्याप्त बिजली बनेगी, तो कटौती कम होगी और घरों, कारोबारों व उद्योगों को बिजली की सप्लाई मिलेगी। दूसरी ओर, बची हुई बिजली नेशनल ग्रिड में जाएगी, जिससे पूरे देश की ऊर्जा आपूर्ति मजबूत होगी इसके साथ-साथ, लगभग 9 साल तक चलने वाले निर्माण कार्य से हजारों इंजीनियरों, मजदूरों और स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा, जिससे इलाके में आर्थिक गतिविधियां तेज होंगी। और अंत में, यह प्रोजेक्ट एक कड़ा संदेश भी देता है भारत अब पानी पर राजनीति नहीं, बल्कि अपने अधिकारों का पूरा इस्तेमाल करेगा, जिसका सीधा फायदा देश के नागरिकों को मिलेगा।

कुल मिलाकर कहें तो, सावलकोट प्रोजेक्ट सिर्फ ईंट और कंक्रीट का कोई ढांचा नहीं है, बल्कि यह बदलते भारत की नई पहचान है। यह चिनाब की लहरों से पैदा होने वाली वह बिजली है, जो न केवल जम्मू-कश्मीर के अंधेरों को दूर करेगी, बल्कि विकास की एक नई सुबह भी लाएगी। सावलकोट प्रोजेक्ट का पूरा होना यानी सुरक्षित बॉर्डर, आत्मनिर्भर जम्मू-कश्मीर और ऊर्जा के क्षेत्र में एक शक्तिशाली भारत।

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देश

स्कूल मर्जर या शिक्षा का संकट? देश भर में 93,000 स्कूलों पर लटका ताला, UP-MP का हाल सबसे बुरा

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एक तरफ हम डिजिटल इंडिया और वर्ल्ड क्लास एजुकेशन की बात कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ हमारे अपने ही देश में शिक्षा के मंदिर कम होते जा रहे हैं। ये बात हम नहीं कह रहे, सरकार ने खुद अपने आंकड़ों में बताया है कि पिछले 10 साल में देश के 93000 स्कूलों पर ताला लटक गया है। आईये जानते है क्या है मामला

संसद मे उठा मामला

यह मामला तब सामने आया जब लोकसभा में बजट सत्र के दौरान बिहार और राजस्थान के सांसदों ने सरकारी स्कूलों की हालत पर सवाल पूछा। बिहार से कांग्रेस सांसद डॉ. मोहम्मद जावेद और राजस्थान से सांसद भजन लाल जाटव के सवालों का जवाब देते हुए केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी ने साफ किया कि पिछले दस वर्षों में भारत में 93,000 से ज्यादा स्कूल बंद हो चुके हैं। आंकड़ों को गहराई से देखें तो सबसे बुरा दौर 2014 से 2020 के बीच रहा। इन 6 सालों में ही 70,000 स्कूल हमेशा के लिए बंद हो गए। इसके बाद कोरोना काल  में भी स्कूल बंद होने का सिलसिला नहीं थमा और करीब 18,700 स्कूल और कम हो गए।

क्या है राज्यों का हाल?

इन आंकड़ों में सबसे बुरा हाल यूपी का है जहां 24,600 स्कूल बंद हो चुके हैं। सरकार का कहना है कि ऐसे स्कूल जहां बच्चों की संख्या कम है उनको बड़े स्कूलों में मर्ज कर दिया गया है। इस मर्जर से अब बच्चों को कई किलोमीटर तक पैदल चल कर जाना पड़ रहा है। अब अगर बात करें एमपी की तो वहाँ भी हालात लगभग यूपी जैसे ही हैं। यहाँ पिछले 10 साल में प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के 22,400 स्कूल बंद हो चुके है। खास तौर पर आदिवासी अंचलों में स्कूलों की संख्या कम होने से ‘ड्रॉपआउट रेट’ यानी पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों की संख्या बढ़ने का खतरा है। इसी तरह ओडिशा सरकार ने हाल के वर्षों में ‘स्कूल कंसोलिडेशन’ नीति अपनाई है, जिसके तहत कम बच्चों वाले स्कूलों को बंद कर बड़े स्कूलों में मिलाया गया। साथ ही झारखंड में करीब 5,000 और राजस्थान में 2,500 से ज्यादा स्कूलों पर ताला लगा है।

जम्मू-कश्मीर के आंकड़े भी डराने वाले

हाल के वर्षों, यानी 2020-21 से 2024-25 के बीच की स्थिति देखें तो जम्मू-कश्मीर के आंकड़े भी डराने वाले हैं। यहाँ करीब 4,400 स्कूलों को बंद किया गया है इसी दौरान मध्य प्रदेश में फिर से 6,900 स्कूलों को बंद करने की प्रक्रिया हुई। पश्चिम बंगाल और ओडिशा में भी एक-एक हजार से ज़्यादा स्कूल बंद हो गए हैं, जबकि महाराष्ट्र और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में भी सैकड़ों स्कूल बंद हुए हैं

सरकार भले ही इसे संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल या स्कूलों के मर्जर का नाम दे, लेकिन हकीकत यही है कि हजारों बस्तियों और टोलों से ‘शिक्षा के मंदिर’ गायब हो चुके हैं, इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा है और देश में शिक्षा की बुनियादी पहुँच लगातार कमजोर होती जा रही है।

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