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ए आर रहमान का जन्मदिन: 200 रुपये से लेकर ऑस्कर तक, उनकी सफल यात्रा की कहानी जानें
ए.आर. रहमान का जन्मदिन विशेष: भारतीय संगीत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने वाले ए.आर. रहमान आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। 6 जनवरी 1967 को जन्मे, रहमान न केवल एक उत्कृष्ट संगीतकार हैं, बल्कि वे अपने जुनून और संघर्ष का एक जीवंत उदाहरण हैं, जिसने उन्हें दुनिया के सबसे आदरणीय म्यूजिक आइकन में स्थान दिलाया। उनके जन्मदिन के अवसर पर, जानते हैं उनकी जीवन से जुड़े कुछ रोमांचक और प्रेरणादायक पहलु।
दिलीप कुमार से ए.आर. रहमान बनने की यात्रा
ए.आर. रहमान का जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ, जहां उनका नाम ए.एस. दिलीप कुमार था। उनकी बहन की गंभीर बीमारी के दौरान एक पीर की दुआ से राहत मिलने के बाद, पूरा परिवार इस्लाम धर्म अपनाने का निर्णय लिया। इसके फलस्वरूप दिलीप कुमार का नाम बदलकर अल्लाह रखा रहमान हो गया।
स्कूल बंद, संगीत बना जीवन का सहारा
केवल 15 वर्ष की आयु में कम उपस्थिति के कारण रहमान को स्कूल छोड़ना पड़ा। परिवार की जिम्मेदारियों के चलते, उन्होंने इलैयाराजा की म्यूजिक ट्रूप में कीबोर्ड प्लेयर के रूप में काम करना शुरू किया। यहीं से उनके पेशेवर करियर की शुरुआत हुई। बाद में, उन्हें ट्रिनिटी कॉलेज, ऑक्सफोर्ड में वेस्टर्न क्लासिकल म्यूजिक की पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप भी प्राप्त हुई।
रुपए 200 की कमाई से शुरुआत
रहमान ने एक इंटरव्यू में कहा था कि 1984 में वे प्रसिद्ध संगीतकार रमेश नायडू के साथ काम कर रहे थे, और उस समय उनकी रोजाना की आय केवल 100 से 200 रुपये थी। यही वह समय था जब उनके संघर्ष की असली पहचान हुई।
‘योधा’ थी उनकी पहली फिल्म, ‘रोजा’ नहीं
कई लोग मानते हैं कि रहमान की पहली फिल्म ‘रोजा’ थी, लेकिन वास्तव में उनका डेब्यू मलयालम फिल्म ‘योधा’ (1992) से हुआ। ‘रोजा’ ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई।
ऑस्कर की ओर बढ़ता सफर
फिल्म ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ का गाना ‘जय हो’ पहले ‘युवराज’ के लिए बनाया गया था। बाद में, इसी गाने ने रहमान को दो ऑस्कर जीते। दिलचस्प बात यह है कि फिल्म ‘ताल’ के दौरान सुभाष घई ने उनके ऑस्कर जीतने की भविष्यवाणी की थी, जिसे रहमान ने मजाक में लिया था।
सादगी और समर्पण आज भी कायम
रहमान रात के सन्नाटे में संगीत बनाने का आनंद लेते हैं और स्टूडियो में पूरी तरह से अपने काम में लीन हो जाते हैं। टेक्नोलॉजी के प्रति उनका प्रेम आज भी उनके संगीत में स्पष्ट रूप से नजर आता है।
ए.आर. रहमान की यात्रा इस बात का प्रमाण है कि मेहनत, विश्वास और मेहनत से कोई भी सपना साकार हो सकता है।