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ईरान युद्ध का असर अब बोतलबंद पानी पर, महंगा हो सकता है पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर

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ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का असर अब भारत के कई उद्योगों पर दिखने लगा है। तेल, एलपीजी और कई औद्योगिक क्षेत्रों के बाद अब इसका प्रभाव बोतलबंद पानी के कारोबार पर भी पड़ने की आशंका जताई जा रही है। टेक्सटाइल, आम, ज्वैलरी, स्टील और एल्युमीनियम जैसे क्षेत्रों में पहले ही लागत बढ़ने और मुनाफा घटने की खबरें सामने आ चुकी हैं। अब यही दबाव पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर इंडस्ट्री पर भी दिखने लगा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अभी तक ग्राहकों पर कीमतों का सीधा असर नहीं पड़ा है, लेकिन रिसेलर्स और छोटे निर्माता इसकी मार झेलने लगे हैं।

भारत में कितना बड़ा है बोतलबंद पानी का कारोबार?

रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत का बोतलबंद पानी उद्योग करीब 5 अरब डॉलर (लगभग 46,150 करोड़ रुपये) का है और यह दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक माना जाता है। इस क्षेत्र में कई बड़ी कंपनियां सक्रिय हैं, जिनमें Bisleri, Kinley, Aquafina, Reliance Industries और Tata Group शामिल हैं। इस बाजार में ‘नेचुरल मिनरल वाटर’ का कारोबार करीब 400 मिलियन डॉलर (लगभग 3,692 करोड़ रुपये) का है। इसे खास तौर पर प्रीमियम और वेलनेस प्रोडक्ट के रूप में देखा जा रहा है। पिछले साल प्रीमियम सेगमेंट की हिस्सेदारी लगभग 8 प्रतिशत रही, जबकि 2021 में यह सिर्फ 1 प्रतिशत थी।

युद्ध से क्यों बढ़ रही लागत?

ईरान युद्ध के कारण होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने की आशंका से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। कच्चे तेल से बनने वाला पॉलिमर प्लास्टिक बोतलों के निर्माण में इस्तेमाल होता है। इसी वजह से प्लास्टिक बोतल, कैप, लेबल और पैकेजिंग बॉक्स की लागत बढ़ने लगी है। रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात में PET पॉलिमर की कीमतों में करीब 12 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। राज्य में 10,000 से अधिक प्लास्टिक निर्माण इकाइयां हैं, जो इस बढ़ती लागत का दबाव महसूस कर रही हैं।

बोतल बनाने की लागत में बड़ा उछाल

उद्योग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, फरवरी के अंत तक 200 मिलीलीटर की प्लास्टिक बोतल बनाने की लागत लगभग ₹1.10 थी, जो अब बढ़कर ₹1.45 हो गई है। वहीं Gujarat State Plastic Manufacturers Association के अनुसार, पॉलिमर की कीमत 18 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 32 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है, जिससे छोटे निर्माताओं पर सबसे ज्यादा दबाव पड़ा है।

कच्चे माल की कमी से उत्पादन प्रभावित

क्लियर वाटर बॉटल के निदेशक Nayan Shah के मुताबिक, रिफाइनरियों से PET की भारी कमी हो गई है और केवल लंबे अनुबंध वाले बड़े संगठित खिलाड़ियों को ही पर्याप्त आपूर्ति मिल रही है। उन्होंने बताया कि पिछले दो हफ्तों में PET की कीमतों में करीब 40 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है। कंपनी की रोजाना 75 लाख बोतल बनाने की क्षमता है, लेकिन कच्चे माल की कमी के कारण फिलहाल सिर्फ 50 लाख बोतलें ही तैयार की जा रही हैं।

पैकेजिंग की लागत भी तेजी से बढ़ी

प्लास्टिक बोतल बनाने वाली सामग्री की कीमत लगभग 50 प्रतिशत बढ़कर 170 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। वहीं बोतल के ढक्कन की कीमत भी दोगुनी होकर करीब 0.45 रुपये प्रति नग हो गई है। इसके अलावा पैकेजिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले बॉक्स, लेबल और एडहेसिव टेप की कीमतें भी तेजी से बढ़ रही हैं।

ग्राहकों पर कब पड़ेगा असर?

फिलहाल ग्राहकों को इसकी सीधी मार नहीं झेलनी पड़ रही है, लेकिन छोटे निर्माताओं और रिसेलर्स के लिए स्थिति मुश्किल होती जा रही है। Federation of All India Packaged Drinking Water Manufacturers Association के अनुसार, करीब 2,000 छोटे निर्माताओं ने रिसेलर्स के लिए बोतल की कीमत लगभग ₹1 प्रति बोतल बढ़ा दी है, जो लगभग 5 प्रतिशत की वृद्धि है। आने वाले समय में यह बढ़ोतरी 10 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। आमतौर पर उपभोक्ता एक लीटर की बोतल के लिए 20 रुपये से कम कीमत चुकाते हैं। फेडरेशन के महासचिव Apoorva Doshi का कहना है कि अभी बाजार में अनिश्चितता की स्थिति है और अगले कुछ दिनों में इसका असर सीधे ग्राहकों को चुकानी पड़ने वाली कीमतों पर भी दिख सकता है।

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मंदिरों में जानवरों की बलि पर लगेगी रोक? SC ने मांगा केंद्र का पक्ष

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मंदिरों में धार्मिक परंपराओं के नाम पर पशुओं की बलि पर रोक लगाने की मांग से जुड़ी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। अदालत ने इस मामले में पशुपालन मंत्रालय को नोटिस जारी कर चार हफ्ते के भीतर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है। इस मामले की सुनवाई जस्टिस Vikram Nath और जस्टिस Sandeep Mehta की बेंच ने की।

जनहित याचिका में उठाया गया मुद्दा

यह जनहित याचिका (PIL) एडवोकेट Shruti Bisht की ओर से दाखिल की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मंदिरों में होने वाली पशु बलि के मामलों में सरकार की ओर से पर्याप्त और प्रभावी कार्रवाई नहीं की जा रही है। याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई फैसलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि हर जीव को जीवन का अधिकार प्राप्त है।

संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि जीवन का अधिकार केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि पशु-पक्षियों सहित सभी जीवों के जीवन की रक्षा भी इसी सिद्धांत के अंतर्गत आती है। इस आधार पर अदालत से आग्रह किया गया है कि पशुओं को भी उचित कानूनी संरक्षण दिया जाए।

कानून में बदलाव की मांग

याचिका में प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स एक्ट, 1960 की धारा 28 में संशोधन की मांग की गई है। इस कानून के अनुसार यदि किसी धार्मिक परंपरा के तहत किसी जानवर की हत्या की जाती है, तो उसे अपराध नहीं माना जाता। याचिकाकर्ता ने इस प्रावधान को चुनौती देते हुए अदालत से अपील की है कि धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान होने वाली पशु बलि पर रोक लगाने के लिए सख्त कानून बनाए जाएं।

कई क्षेत्रों में आज भी जारी है यह परंपरा

याचिका में यह भी कहा गया है कि दुनिया के कई हिस्सों में आज भी पशु बलि की परंपरा जारी है। इसमें इंडोनेशिया के बाली, नेपाल और भारत के कुछ क्षेत्र जैसे हिमालयी इलाके, पूर्वोत्तर भारत, ओडिशा, बंगाल, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के कुछ हिस्से शामिल हैं। आमतौर पर बलि के लिए युवा और स्वस्थ नर पशुओं को चुना जाता है।

जागरूकता और सख्त कानून की मांग

याचिका में इस प्रथा को समाप्त करने के लिए व्यापक कदम उठाने की जरूरत बताई गई है। इसके तहत कड़े कानून बनाने, लोगों में जागरूकता बढ़ाने और गैर-सरकारी संगठनों के साथ मिलकर अभियान चलाने की सिफारिश की गई है। अब इस मामले में केंद्र सरकार के जवाब के बाद सुप्रीम कोर्ट आगे की सुनवाई करेगा।

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SC में ब्लड डोनेशन नियम पर बहस… ट्रांसजेंडर्स, समलैंगिक पुरुष और सेक्स वर्कर्स क्यों नहीं कर सकते रक्तदान?

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ट्रांसजेंडर्स, सेक्स वर्कर्स और समलैंगिक पुरुषों को ब्लड डोनेट करने से रोकने वाले नियमों को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा है। इस मुद्दे पर केंद्र सरकार ने अदालत में हलफनामा दाखिल कर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। सरकार ने कहा है कि यह प्रतिबंध किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और मरीजों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लगाया गया है।

2017 में लागू हुआ था नियम

केंद्र सरकार ने वर्ष 2017 में ब्लड डोनेशन से जुड़े नियमों में बदलाव करते हुए ट्रांसजेंडर्स, समलैंगिक पुरुषों और सेक्स वर्कर्स को रक्तदान करने से रोकने का प्रावधान किया था। सरकार के अनुसार, यह फैसला स्वास्थ्य संबंधी रिसर्च और वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर लिया गया था।

याचिका के बाद SC ने जारी किया नोटिस

सरकार के इस फैसले को चुनौती देते हुए शरीफ डी. रंगनेकर नाम के एक व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने केंद्र सरकार के साथ-साथ राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO) और राष्ट्रीय रक्ताधान परिषद को भी नोटिस जारी किया था। इसके जवाब में अब केंद्र सरकार ने अपना हलफनामा दाखिल किया है।

सरकार ने क्या कहा?

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने अदालत को बताया कि कई शोध और मेडिकल अध्ययनों के आधार पर यह पाया गया है कि ट्रांसजेंडर्स, समलैंगिक पुरुषों और महिला सेक्स वर्कर्स में HIV, हेपेटाइटिस-B और हेपेटाइटिस-C संक्रमण का जोखिम अधिक पाया जाता है। सरकार के मुताबिक, इन वर्गों के लोगों के रक्तदान से संक्रमण फैलने का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में 6 से 13 गुना तक अधिक हो सकता है। इसलिए मरीजों की सुरक्षा को देखते हुए यह प्रतिबंध लगाया गया है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लागू हैं ऐसे नियम

सरकार ने यह भी कहा कि इस तरह के नियम केवल भारत में ही नहीं, बल्कि कई अन्य देशों में भी लागू हैं। इनका उद्देश्य रक्त चढ़ाने वाले मरीजों को संक्रमण से सुरक्षित रखना है।

याचिका में क्या कहा गया है?

याचिकाकर्ता का कहना है कि 2017 में जारी की गई यह गाइडलाइन संविधान के तहत मिले समानता और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन करती है। याचिका में तर्क दिया गया है कि बिना व्यक्तिगत जांच किए किसी पूरे वर्ग को ब्लड डोनेशन से रोकना भेदभावपूर्ण है और इससे यह संदेश जाता है कि सरकार इन लोगों को स्वतः ही गंभीर बीमारी से ग्रस्त मान रही है।

तीन जजों की बेंच कर रही है सुनवाई

इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ कर रही है। वहीं केंद्र सरकार की ओर से Aishwarya Bhati अदालत में पक्ष रख रही हैं।

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SC ने ठुकराई पीरियड लीव की मांग, कहा- ‘नियम बनाया तो महिलाओं की नौकरी पर उल्टा असर…’

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महिला कर्मचारियों को मासिक धर्म के दौरान अवकाश देने की मांग से जुड़ी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि पीरियड लीव को कानूनन अनिवार्य बनाना महिलाओं के लिए फायदे से ज्यादा नुकसानदेह साबित हो सकता है।

कोर्ट बोला—महिलाओं को कमजोर मत मानिए

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि महिलाओं को इस तरह कमजोर दिखाना सही नहीं है। कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में यह मांग उचित लग सकती है, लेकिन अगर इसे अनिवार्य नियम बना दिया गया तो इसका उल्टा असर पड़ सकता है। अदालत के मुताबिक, ऐसी स्थिति में कई नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से बच सकते हैं, जिससे उनके रोजगार के अवसर प्रभावित हो सकते हैं।

सरकार से नीति बनाने का सुझाव

कोर्ट ने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता पहले ही इस मामले में केंद्र सरकार को ज्ञापन दे चुके हैं। अदालत ने संकेत दिया कि केंद्र सरकार सभी राज्यों और संबंधित संस्थाओं से बातचीत कर इस मुद्दे पर कोई संतुलित व्यवस्था बना सकती है।

वर्कप्लेस पर मानसिकता का भी जिक्र

मुख्य न्यायाधीश Surya Kant और जस्टिस Joymalya Bagchi की बेंच ने कहा कि इस तरह की मांग से कार्यस्थल पर महिलाओं के प्रति गलत मानसिकता बन सकती है। सीजेआई ने कहा कि ऐसी याचिकाएं महिलाओं को कमजोर दिखाती हैं और मासिक धर्म को किसी नकारात्मक या असामान्य घटना की तरह पेश करती हैं, जिससे उनके पेशेवर विकास पर असर पड़ सकता है।

याचिकाकर्ता की दलील

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता M. R. Shamshad ने दलील दी कि कुछ राज्यों और निजी कंपनियों ने पहले से ही इस तरह की व्यवस्था लागू की है। उदाहरण के तौर पर केरल सरकार ने स्कूलों में इस तरह की सुविधा शुरू की है और कई निजी कंपनियां भी स्वेच्छा से पीरियड लीव दे रही हैं।

अनिवार्य नियम बनाने पर जताई चिंता

इस पर अदालत ने कहा कि यदि कोई संस्था स्वेच्छा से ऐसी सुविधा देती है तो यह अच्छी पहल है। लेकिन अगर इसे कानूनी रूप से अनिवार्य बना दिया गया, तो कई नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से हिचक सकते हैं। कोर्ट के मुताबिक, ऐसी स्थिति में महिलाओं के लिए नौकरी के अवसर कम हो सकते हैं और उनके करियर पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।

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