नीदरलैंड के हेग में परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन है और इसे मध्यस्थता अदालत भी कहा जाता है। इस अदालत ने कहा है कि सिंधु जल संधि अभी भी लागू है। अदालत का कहना है कि भारत या पाकिस्तान में से कोई भी देश अकेले इस संधि को खत्म नहीं कर सकता और ना ही इसे रोक सकता है। अदालत ने भारत के उस फैसले पर भी सवाल उठाया है, जिसमें भारत ने संधि को ‘स्थगित’ करार किया है। साथ ही जम्मू-कश्मीर में बन रही रतले जलविद्युत परियोजना पर भी रोक लगाने जैसे निर्देश दिए हैं।

भारत ने क्यों किया फैसला मानने से इंकार?

भारत ने इस फैसले को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत इस अदालत को मानता ही नहीं है। भारत का कहना है कि ये अदालत गैर-कानूनी तरीके से बनाई गई है। जब हम इसके बनने को ही नहीं मानते, तो इसका फैसला कैसे मानेंगे। भारत ने इस पूरी सुनवाई में हिस्सा भी नहीं लिया था। भारत ने कहा कि न तो ये फैसला, न ही इससे पहले के फैसले भारत पर लागू होते हैं। वॉशिंगटन में भारतीय एम्बेसी ने भी यही बात दोहराई है। एम्बेसी ने कहा कि इस कोर्ट का गठन ही सिंधु जल संधि के नियमों के खिलाफ है। इसलिए इसके फैसले की कोई कानूनी अहमियत नहीं है। भारत का साफ कहना है कि संधि से जुड़ा फैसला लेना भारत का अपना अधिकार है और फिलहाल संधि ‘स्थगित’ ही रहेगी।

कैसे शुरू हुआ विवाद?

भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि 1960 में हुई थी। इसमें विश्व बैंक ने मदद की थी। इस संधि में 6 नदियों के पानी को बांटा गया था। 3 पूर्वी नदियां - रावी, ब्यास और सतलुज का पानी भारत इस्तेमाल करेगा। और 3 पश्चिमी नदियां - सिंधु, झेलम और चिनाब का पानी मुख्य रूप से पाकिस्तान के लिए रखा गया था। हालांकि, भारत को भी इन पर कुछ हक दिया गया था। भारत ने पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद कहा कि आतंकवाद और पानी का समझौता एक साथ नहीं चल सकता। जब तक पाकिस्तान सीमा पार से आतंकवाद बंद नहीं करता, तब तक संधि बहाल नहीं होगी।

पाकिस्तान का क्या कहना है?

पाकिस्तान चाहता है कि संधि चलती रहे। पाकिस्तान ने भारत के संधि रोकने के फैसले का विरोध किया है और इस मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया है। पाकिस्तान का कहना है कि भारत को संधि के नियम मानने चाहिए। जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी पर रतले हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट बन रहा है। पाकिस्तान को इस प्रोजेक्ट के डिजाइन पर आपत्ति है। पाकिस्तान का कहना है कि इससे उसके हिस्से के पानी पर असर पड़ेगा। इसी प्रोजेक्ट को लेकर हेग की अदालत ने रोक लगाने की बात कही थी, जिसे भारत ने मानने से मना कर दिया।

अब आगे क्या होगा?

ये विवाद अब सिर्फ पानी का नहीं रहा। ये राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बन गया है। भारत अपने फैसले पर कायम है। पाकिस्तान संधि को लागू रखना चाहता है। इससे दोनों देशों के बीच जल को लेकर तनाव और बढ़ सकता है। जम्मू-कश्मीर के पावर प्रोजेक्ट्स पर भी विवाद बढ़ सकता है।