(By-Anshuman Tripathi) जंतर मंतर पर नीट पेपर लीक को लेकर हुए प्रदर्शन को लेकर दायर की गई सभी 13 एफआईआर सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत मिले विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए रद्द कर दी हैं। लेकिन प्रोटेस्ट के दौरान हुए उपद्रव और हिंसा के मामले में दिल्ली पुलिस द्वारा चिन्हित लोगों पर 2873 नई एफआईआर दर्ज करने की अनुमति दे दी है। इस आंदोलन के आयोजक रही कॉकरोच जनता पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का स्वागत किया है। साथ ही सीजेपी ने 5 सितंबर को होने वाले मार्च की अपील को वापिस ले लिया है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से आंदोलनकारियों में खुशी का माहौल है वहीं, केंद्र सरकार ने भी राहत की सांस ली है। अगले हफ्ते दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन की तैयारियों के बीच युवाओं के होने वाले प्रदर्शन को लेकर सरकार और पुलिस-प्रशासन ने चिंता बढ़ा दी थी। दिल्ली पुलिस के अलावा बिहार, प. बंगाल, असम और महाराष्ट्र पुलिस ने भी अपने-अपने राज्यों में प्रदर्शनकारियों पर दर्ज रिपोर्ट्स को रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई थी। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से इन राज्यों में भी प्रोटेस्ट को लेकर दर्ज एफआईआर खारिज हो गई हैं।

जंतर मंतर प्रोटेस्ट में दर्ज हुईं एफआईआर

20 जुलाई से 25 जुलाई के बीच हुई हिंसा की घटनाओं को लेकर दिल्ली पुलिस ने 13 एफआईआर दर्ज की थीं। इन एफआईआर को वापिस लेने की मांग पूरी न होने पर कॉकरोच जनता पार्टी ने 5 सितंबर को इंडिया गेट से दिल्ली पुलिस मुख्यालय तक मार्च का ऐलान किया था। लेकिन दिल्ली पुलिस ने कहा है कि उसने 2873 आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों की पहचान की है, जो आंदोलन के दौरान हिंसा करने और उकसाने का काम कर रहे थे।

कैसे हुई आपराधिक तत्वों की पहचान?

खबरें आ रही थीं कि प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों ने बॉडी कैम पहन रखे थे, जिनसे रिकॉर्ड किए वीडियो के आधार पर दिल्ली पुलिस ने अपराधियों के डिजिटल रिकॉर्ड्स से मिलान किया। चीन और अमरीका जैसे उन्नत देशों में आर्टिफिशियल इंटेलीजेस की मदद से डिजिटल फुटप्रिंट की ऑनलाइन आईडेंटिफिकेशन किया जाता है। लेकिन इस प्रोटेस्ट के दौरान पहली बार दिल्ली पुलिस के पास अपने डेटाबेस से ऑनलाइन मिलान किए जाने की खबरें आई थीं। दिल्ली पुलिस का कहना है कि प्रदर्शन के दौरान हिंसा में शामिल इन 2873 लोगों के आपराधिक रिकॉर्ड हैं।

सरकार की भूमिका पर सवाल

केंद्र सरकार की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से कहा कि पेपर लीक से प्रभावित युवाओं की आत्महत्या के मामलों में मुआवजा देने का आदेश देना सही नहीं होगा। बल्कि यह एक कानूनी मिसाल बन जाएगी। तुषार मेहता ने अदालत से सरकार के दिए वचन को रिकॉर्ड में ले कर तीन महीने का समय की मांग की। मेहता ने भरोसा दिया कि सरकार अपने वादे को पूरा करने के लिए एक फार्मूला तैयार कर रही है।

हिंसा की जांच के लिए कमेटी

इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा की जांच के लिए एक हाई पॉवर्ड कमेटी का गठन कर चुका है। इसमें न्यायपालिका और सुरक्षा क्षेत्र से जुड़े 5 विशेषज्ञों को शामिल किया गया है। कमेटी से अगली सुनवाई तक अपनी अंतरिम रिपोर्ट पेश करने को कहा गया है। अगली सुनवाई 10 सितंबर को होगी।

 क्यों हुआ आंदोलन?

दरअसल  कुछ युवा वकीलों को लेकर भारत के मुख्य न्यायधीश जस्टिस सूर्यकांत ने अपनी टिप्पणी में कॉकरोच शब्द का इस्तेमाल किया था। जिसकी वजह से युवाओं के आक्रोश से सोशल मीडिया में तूफान उठ गया। 16 मई से शुरू हुए इस विवाद के बाद खुद को कॉकरोच बता कर अपनी नाराजगी जाहिर करने वाले समूह ने नीट पेपर लीक के मामलों को लेकर जंतर मंतर पर प्रदर्शन शुरू कर दिया। पेपर लीक मामले में 20 से ज्यादा बच्चों की आत्महत्या के मामले सामने आने से देश के युवाओं में ज़बर्दस्त नाराजगी थी। आंदोलन के नेताओं ने 6 जून को कॉकरोच जनता पार्टी का गठन कर लिया। 20 जून को मशहूर पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की अगुआई में जंतर मंतर पर भूख हड़ताल शुरू हो गई। 21 दिन तक अनशन से हालत बिगड़ने पर वांगचुक को  18 जुलाई को सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया। देश भर में वांगचुक को बचाने की मुहिम ने जोड़ पकड़ लिया। साथ ही प्रदर्शनकारी युवाओं का धीरज जवाब देने लगा। 20 जुलाई को पुलिस ने छात्रों पर लाठी चार्ज किया। आरोप है कि पुलिस ने बहुत बर्बरता से कीलें लगी हुई लाठियां चलाईं। साथ ही सिविल ड्रेस में कई लोगों को बुला कर युवाओं को क्रूरता से पिटवाया गया। रैपिड एक्शन फोर्स ने पैलेट गन चलाई और इलेक्ट्रिक बैटन से युवाओं को बिजली के झटके दिए। बैरिकेड्स को एक दूसरे से वेल्ड कर के उन पर बिजली का करेंट दौड़ाया गया।  लेकिन एक महिला के पीछे लाठी घुसाने के वीडियो ने छात्रों का क्रोध भड़का दिया। उसके बाद पूरे कनाट प्लेस में देश भर से बड़ी तादाद में युवा पहुंच गए और कई जगह दिन और रात में पुलिस-छात्रों के बीच हिंसक झड़पों की खबरें भी आई।

विपक्ष को मिला सरकार के खिलाफ मुद्दा

 युवाओं पर हिंसा को लेकर देश के विपक्षी दलों ने भी केंद्र सरकार को घेरना शुरू कर दिया। जवाबदेही की मांग को लेकर संसद का मानसून सत्र लगभग धुल गया। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी प्रधानमंत्री निवास पर धरने पर बैठ गए। जिन्हे बड़ी मशक्कत से हटाया गया लेकिन जेन जी के बढ़ते गुस्से और विपक्ष के मुद्दे को देखते हुए केंद्री शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा।

पैलेट गन का भी हुआ थखा इस्तेमाल

हालांकि दिल्ली पुलिस शुरुआत में पैलेट गन के इस्तेमाल के दावे को खारिज करती रही, लेकिन मीडिया में लगभग दस लोगों के पैलेट गन से जख्मी होने की खबरें सामने आईं। इनमें से एक पीड़ितो को राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस में पेश कर दिया। विपक्ष सड़क और संसद में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह यही सवाल पूछ रही है कि पैलेट गन किसके आदेश पर चलाई गई। लेकिन अमित शाह जवाब देने संसद नहीं पहुंचे।

जेन जी की ताकत का अहसास

इसे केंद्र सरकार की बचाव की मुद्रा के रूप में देखा गया। धीरे धीरे यूपी, बिहार, बंगाल. असम, महाराष्ट्र और पूर्वोत्तर राज्यों समेत देश में फैलने लगा। आंदोलन के दौरान जंतर मंतर और सोशल मीडिया में जिस कदर युवाओं ने अपना आक्रोश व्यक्त किया। उसे देख कर महसूस किया गया कि जेन जी अब जवाबदेही तय करने की मांग करने लगी है। उसे इधर-उधर की बातों से फुसलाया नहीं जा सकता। दरअसल देश में जेन जी की तादाद लगभग 37 करोड़ के लगभग बताई जा रही है। इसमें से बड़ी तादाद में जेन जी 2029 के आम चुनाव में पहली बार मतदान करेगी। पहले तो सत्तारूढ़ दल के समर्थक संगठनों ने जेन जी से सख्ती से निपटने के बयान जारी किए। यहां तक कि कुछ संगठनों ने आंदोलन में शामिल हुए युवक-युवतियों को सड़कों पर घेर कर डराना-धमकाना शुरू कर दिया। लेकिन जल्द ही उन्हें जेन जी की ताकत का अहसास हो गया। खुद प्रधानमंत्री ने इंस्टाग्राम पर रील बना कर जेन जी को शांत करने का प्रयास किया। समझा जाता है कि प्रधानमंत्री के इशारे पर ही सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मुकदमें वापिस लेने की पहल की गई है।