केंद्र सरकार सितंबर माह में महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक पारित करने के लिए विशेष सत्र बुला सकती है। खबरों के मुताबिक सरकार इन विधेयकों को पारित करने के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश में जुटी हुई है। ये बिल पास कराने के लिए सरकार को दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता है। हालांकि विशेष सत्र की औपचारिक घोषणा तब की जाएगी, जब सरकार समर्थन हासिल करने को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हो जाएगी। सूत्रों का कहना है कि केंद्र समर्थन के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों से लगातार परामर्श कर रही है।विशेष सत्र बुलाने की संभावना इसलिए जताई जा रही है क्योंकि 13 अगस्त को मानसून सत्र का औपचारिक अवसान न करके अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया है। तकनीकी भाषा में कहें तो मानसून सत्र अब भी जारी है। संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजिजू ने हाल ही में महिला आरक्षण और डिलिमिटेशन बिल को पारित कराने के लिए सत्र बुलाए जाने के संकेत दिए हैं। जिसके बाद राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर कहा है कि विशेष सत्र आमंत्रित करने से पहले उन्हें सर्वदलीय बैठक बुलानी चाहिए। दावा किया जा रहा है कि केंद्र सरकार इन विधेयको को पारित करवाने के लिए आवश्यक सांसदों के समर्थन के करीब पहुंच चुकी है। समझा जा रहा है कि सरकार डीएमके और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का समर्थन पाने के प्रयास में हैं। इसके बावजूद विपक्ष के कुछ सांसदों के सदन से गैर हाजिर होने पर ही ये विधेयक पारित कराए जा सकते हैं।
किरण रिजिजू ने क्या कहा
संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजिजू ने एक साक्षात्कार में कहा था कि "यह पूरी तरह सरकार पर निर्भर करता है। संसद सत्र बुलाने का फैसला सरकार करती है और राष्ट्रपति से सत्र बुलाने का अनुरोध करती है। जब सत्र आधिकारिक रूप से खत्म नहीं हुआ है, सत्र दोबारा बुलाया जा सकता है।” सरकार ने इससे पहले 16 से 18 अप्रेल के बीच विशेष सत्र बुलाकर महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक पारित करवाने की कोशिश की थी। लेकिन सरकार बिल पास कराने के लिए जरूरी आंकड़े जुटा नहीं पाई। लोकसभा में विधेयक के पक्ष में 298 वोट पड़े और विरोध में 230 सांसदों ने अपने मत डाले।
NDA के पास कितनी ताकत
आम आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सांसद बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। उद्धव ठाकरे की शिवसेना के 7 सांसद भी शिंदे शिवसेना में शामिल हो चुके हैं, जो एनडीए के साथ है। टीएमसी के भी 20 सांसदों के एनडीए को समर्थन देना तय माना जा रहा है। कुल मिलाकर अप्रेल से अब तक 36 सांसद जुड़ चुके हैं। समझा जा रहा है कि एनडीए ने 318 सांसदों का समर्थन हासिल कर लिया है। लेकिन बिल पास कराने के लिए लोकसभा में 360 सांसदों के समर्थन का आवश्यकता है। जिसे दूर की कौड़ी माना जा रहा है।
विधेयकों की राह में अड़चनें
अव्वल तो डीएमके के समर्थन की संभावना इसलिए जताई जा रही है क्योंकि डीएमके कांग्रेस से नाराज़ चल रही है। लेकिन परिसीमन विधेयक पारित होने से दणिण भारतीय राज्यों को नुकसान की आशंका जताई जा रही है। लिहाजा सरकार को समर्थन देना घरेलू राजनीति की वजह से डीएमके के लिए भी आसान नहीं है। वहीं, टीएमसी के 20 सांसदों की सदस्यता का मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच चुका है। अदालत के सवाल पूछने पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने इन सांसदों को नोटिस जारी कर दिया है। लिहाजा स्पीकर के जवाब से पहले इन सांसदों के समर्थन लेने में कानूनी अड़चन खड़ी हो सकती है। यही वजह है कि समर्थन सुनिश्चित होने तक सरकार विशेष सत्र की घोषणा से बच रही है।
दो तिहाई बहुमत ही क्यों
संविधान संशोधन से जुड़े विषयों के लिए दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक के लिए वर्तमान कानून में संशोधन ज़रूरी होगा।
क्या महिला आरक्षण बिल पास हो चुका है?
महिला आरक्षण के लिए सरकार ने 19 सितंबर, 2023 को लोकसभा में पेश किया था। सभी राजनीतिक दलों ने लगभग आम राय से इस बिल को पारित किया था। साथ ही यह भी सरकार से कहा था कि महिला आरक्षण बिल लागू करने के लिए जनगणना और परिसीमन की शर्त हटाई जानी चाहिए। पारित हुए बिल में साफ लिखा गया था कि यह कानून अगली जनगणना के के आंकड़ों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के बाद ही प्रभावी होगा।
महिला आरक्षण में परिसीमन का पेंच
महिला आरक्षण कानून को 16 अप्रेल को अधिसूचित कर दिया गया है। लेकिन जनगणना की अंतिम रिपोर्ट 2028 के अंत तक आने की उम्मीद है। उसके बाद 2029 की शुरुआत में परिसीमन आयोग का गठन किया जाएगा। ऐसे में 2029 के अगले आम चुनाव से पहले महिला आरक्षण लागू हो पाना संभव नहीं है। लेकिन केंद्र सरकार इसे 2029 से पहले लागू करने के पक्ष में है। लिहाजा अपने ही बनाए कानून में संशोधन करना चाहती है। केंद्र सरकार चाहती है कि 2011 में हुई जनगणना को ही आधार बना कर परिसीमन जल्द से जल्द शुरू कर दिया जाए।
2011 के सेंसस पर परिसीमन का विरोध क्यों
विपक्ष 2026 में 2011 की जनगणना को आधार बना कर परिसीमन का विरोध कर रहा है। विपक्षी दलों का मानना है कि जिन राज्यों ने ईमानदारी से परिवार नियोजन, साक्षरता और मानव विकास संबन्धी योजनाएं लागू की है, उन राज्यों का संसद में प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा। जबकि जिन राज्यों ने लापरवाही बरती है, उनका प्रतिनिधित्व बढ़ जाएगा। अगर ऐसा होता है तो तमिलनाडु,केरल औऱ आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों की संसद में हैसियत कम हो जाएगी। जबकि यूपी, बिहार जैसे उत्तर भारतीय राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ने से उत्तर-दक्षिण का संतुलन बिगड़ जाएगा। इसके अलावा 2011 के आंकड़े देश की जनसंख्या की सही तस्वीर नहीं पेश करते। तबके मुकाबले आबादी काफी बढ़ चुकी है। विपक्ष का कहना है कि पुराने आंकड़ों के आधार पर एक वोट-एक वैल्यू के सिद्धांत यानि सबको और समान प्रतिनिधित्व नहीं दिया जा सकता। ऐसे में नए सिरे से बगैर नई जनगणना के परिसीमन कराने के पीछे सरकार की मंशा साफ नहीं है। कुछ राजनीतिक दल यह भी सवाल उठा रहे हैं कि सांसदों की संख्या बढ़ाने से संसदीय प्रक्रिया पर असर पड़ेगा और देश पर आर्थिक बोझ भी बढ़ेगा। जबकि अमेरिका जैसे देशों में संसद के निचले सदन में जनसंख्या में इजाफे के बावजूद सीटें निर्धारित कर दी गई हैं, ताकि सभी को समुचित प्रतिनिधित्व का मौका मिले। लिहाजा यह राजनीतिक दल अगले कुछ सालों तक सीटों की संख्या को फ्रीज करने की मांग कर रहे हैं।
परिसीमन में सियासत का आरोप
विपक्ष यह भी आरोप लगाता है कि सरकार सत्तारूढ़ पार्टी के हित में निर्वाचन क्षेत्रों में फेरबदल करना चाहती है। उनका यह भी कहना है कि पिछले वर्षों में जम्मू-कश्मीर औऱ असम में परिसीमन से बीजेपी को लाभ हुआ है औऱ डिलिमिटेशन का यही पैटर्न वह पूरे देश में अमल करना चाहती है। विपक्ष दल इसे बीजेपी के सत्ता पर स्थाई कब्जा बनाने के षड़यंत्र के रूप में देख रहे हैं।
जनगणना पर भी उठे सवाल
विपक्ष जनगणना को लेकर भी केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगा रहा है। उसका कहना है कि सरकार जाति जनगणना कराने के अपने वादे से मुकर रही है। उनका कहना है कि डिजिटल जनगणना में ड्रॉप डॉउन मैन्यू नहीं जोड़ा गया है। जिससे नागरिक द्वारा अपनी बताई जाति को ही आधार माना जा रहा है। विपक्ष का कहना है कि ड्रॉप डॉउन मेन्यू में पूर्व निर्धारित जातियों के नाम होने चाहिए, जिससे जातियों के सटीक आंकड़े प्राप्त होंगे। जनगणना में माता-पिता की जन्म तिथि, जन्मस्थान औऱ धर्म से जुड़े सवाल पहली बार जोड़े जाने के पीछे बीजेपी का राजनीतिक एजेंडा बताया जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस की नेता ्मता बनर्जी ने हाल ही में इसे पिछले दरवाजे से एनआरसी यानि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर लागू करने की साजिश बताया है। इसके अलावा आरोप यह भी है कि जनगणना में देरी से देश में दस करोड़ से ज्यादा गरीब तबके के लोग राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत लाभ से वंचित रह गए हैं। डिजिटल जनगणना को लेकर भी सरकार को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। विपक्ष का कहना है कि भारतीय नागरिकों का बहुत महत्वपूर्ण औऱ गोपनीय डेटा बगैर पर्याप्त साइबर सुरक्षा के इकट्ठा हो रहा है, जो न सिर्फ निजता के अधिकार का हनन है बल्कि डेटा चोरी की भी आशंका है।
परिसीमन पर सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार का कहना है कि अनुच्छेद 81 के तहत हर सांसद को लगभग समान संख्या में नागरिकों का प्रतिनिधित्व करना चाहिए। इसके लिए एक लोकसभा क्षेत्र में 18-20 लाख मतदाताओं की संख्या आदर्श स्थिति मानी गई है। लेकिन वर्तमान में कुछ सांसद 30 से 40 लाख तक केृी आबादी वाले निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। तेलंगाना के मल्कानगिरि में 31 लाख मतदाता हैं तो लक्षद्वीप में 55-60 हजार की आबादी पर एक एमपी है। सरकार इस असमानता को दूर करने के लिए परिसीमन कराना चाहती है। लेकिन विपक्ष परिसीमन के लिए नई जनगणना को आधार बनाने की मांग कर रहा है।सरकार ने दक्षिण भारतीय राज्यों की शंका का समाधान करते हुए कहा है कि दक्षिण भारत की मौजूदा सीटों में कमी नहीं आने दी जाएगी। अप्रेल में पेश किए गए परिसीमन विधेयक, 2026 में लोकसभा की कुल सीटों को 543 से बढ़ा कर 850 करने का प्रस्ताव रखा था। सरकार का दावा है कि इस परिसीमन से सभी राज्यों की सीटों में लगभग 40 से 50 फीसदी तक जनसंख्या में अनुपातिक वृद्धि होगी। सरकार भरोसा दे रही है कि किसी भी राज्य को कोई नुकसान नहीं होगा। विपक्ष सरकार से लिखित आश्वासन भी मांग रहा है। लेकिन पूरी परिसीमन प्रक्रिया को संदेह की नज़रों से भी देख रहा है।
सरकार की मजबूरी
दरअसल जब 2023 में सरकार महिला आरक्षण बिल ले कर आई थी, तो सत्तारूढ़ पार्टी समेत कई राजनीतिक दलों के सांसदों में अपनी सीटें घटने की आशंका बनी हुई थी। समझा जा रहा था कि मौजूदा आधार पर अगर महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की जाती हैं, तो लगभग 180 पुरुष सांसदों को अपनी सीटें गंवानी पड़ेंगी। लिहाजा सरकार ने महिला आरक्षण को अगले परिसीमन के बाद से लागू करने का प्रावधान रखा था। लेकिन अगले आम चुनाव के मद्देनज़र 2011 की जनगणना को आधार बना कर परिसीमन करवा कर 850 लोकसभा सीटें तय करने का प्रस्ताव लाया जा रहा है। ताकि लोकसभा में महिलाओं के लिए 250 सीटें आरक्षित हो सकें और पुरुष सांसदों को अपनी सीटें गंवानी नहीं पड़ेंगी।
होगा दिलचस्प मुकाबला
महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक पारित करने के लिए केंद्र सरकार हर संभव प्रयास में जुटी हुई है, वहीं विपक्ष भी परिसीमन को लेकर अपना विरोध जुटाने के लिए एकजुट होने की कोशिश कर रहा है। लेकिन कई विपक्षी दलों की केंद्र सरकार से अंदरखाने चल रही बातचीत ने मामले को रोचक बना दिया है। लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक आने पर सरकार औऱ विपक्ष के बीच शक्ति प्रदर्शन होगा। ऐसे में विधेयक पारित करवाने के लिए संसद में रस्साकशी देखने लायक होगी।